Moral Short Stories

सलीका – Short Moral Story In Hindi

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Written by Abhishri vithalani

सलीका – Short Moral Story In Hindi

वाणी का प्रयोग हमें बहुत सोच – समझकर और सलीके से करना चाहिए। क्योकि हमारी वाणी ही हमें स्वर्ग और नरक दोनों दिखा सकती है। इस कहानी (सलीका – Short Moral Story In Hindi) में यही बताया गया है।

पंजाब के महाराणा रणजीत सिंह बड़े प्रतापी और शूरवीर राजा थे। उनकी वीरता इतिहास के पन्नो में अंकित है। वे बड़े नियमनिष्ठ, धार्मिक, प्रजापालक एवं दुष्ट लोगो के लिए बेहद कठोर थे। साथ ही सज्जनो के लिए बड़े ही मृदुल और विनम्र भी थे।

एक बार वे अपने किले के सम्मुख बुर्ज में बैठे माला जप रहे थे। उनके पास ही प्रसिद्ध मुस्लिम संत अजीमुद्दीन औलिया भी बैठे तस्बीह (माला) फेर (जप) रहे थे।

हिन्दुओ और मुसलमानो के माला फेरने का ढंग अलग – अलग होता है। जैसे हिन्दू लोग माला जपते समय माला के मनको को अंदर की ओर करते है। जबकि मुस्लिम लोग इसके ठीक उलट करते है। वे माला को बाहर की ओर फेरते है।

अजीमुद्दीन भी माला उसी प्रकार बाहर को फेर रहे थे। अचानक राजा का ध्यान इस ओर गया। उन्होंने संत अजीमुद्दीन से पूछा – फ़क़ीर साहब, ये बताइये की माला अंदर की ओर फेरना सही है या बाहर की ओर?

सुनने में तो यह सवाल बड़ा साधारण है, लेकिन उस समय की स्थिति के अनुसार बेहद जटिल था। अगर औलिया कहते कि बाहर कि तरफ फेरना सही है तो इससे हिन्दुओ का तरीका गलत साबित होता।

यदि वे कहते अंदर कि तरफ तो इससे उनका धर्म गलत सिद्ध होता। इसके आलावा अगर कोई जवाब न देते तो इससे राजा का अपमान होता। उस समय संत निजामुद्दीन औलिया ने उत्तर दिया, महाराज! माला फेरने का दो उद्देश्य होता है – बाहर कि अच्छाइयों को अपने अंदर समाहित करना और दूसरा अपनी बुराइयों को बाहर निकालना।

उद्देश्य के अनुसार ही माला फेरना सही है। उन्होंने आगे कहा, आप हमेशा प्रजा कि अच्छाई या भलाई सोचते है एक अच्छे राजा बनने का प्रयत्न करते हो, इसलिए आपका अंदर कि ओर माला फेरना सही है। जिससे अच्छाइया आपके अंदर समाहित हो।

मै एक संत हु। मेरा ध्यान अपनी बुराइयों को बाहर निकालने में लगा रहता है, जिससे मै ईश्वर को प्राप्त कर सकू। इसलिए मै बाहर की ओर माला फेरता हु ताकि मेरे अंदर की बुराइया बाहर निकले जिससे मेरा चित शुद्ध हो सके।

संत की बात सुनकर महाराजा रणजीत सिंह बहुत प्रसन्न हुए। उस दिन से संत निजामुद्दीन औलिया का मान उसकी नजरो में और बढ़ गया।

Moral : वाणी का प्रयोग हमें बहुत सोच – समझकर और सलीके से करना चाहिए। क्योकि जीभ जोग अरु भोग, जीभ बहु रोग बढ़ावै। जीभ धरावै नाम, जीभ सब काम करावै। जीभ स्वर्ग लै जाय, जीभ सब नरक देखावै। निज जीभ होठ एकत्र करि, बाँट सहारे तौलिये। बेताल कहे बिक्रम सुनो, निज जीभ संभारे बोलिये।

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Abhishri vithalani

I am a Hindi Blogger. I like to write stories in Hindi. I hope you will learn something by reading my blog, and your attitude toward living will also change.

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